31 July, 2019

अस्तित्व



अस्तित्व 


सूरज अस्त हो रहा था।  सूरज डूबने की वजह से आसमान में जैसे मेघधनुष्य के रंग फेल गए थे,और उपर  से अपने घर लौटते पंछी नयनरम्य दृश्य बना रहे थे। अमावस्या कि रात को तारे जैसे दृश्य बनाते है वैसा दृश्य इन पंछीओ ने भी बनाया था फर्क सिर्फ इतना था की तारे सफ़ेद लगते है और ये पंछी काले। पर खूबसूरत तो दोनों एकसमान थे।  
सर्दी का मौसम था।  सूरज के अस्त होने तक ठंड अपना राज्य फैला चुकीं थी। एक २१ साल की लड़की अपनी छत पर बैठे बैठे ये नज़ारे देख रही थी। अपने में कितने सरे विचारो को समेटे हुए थी पर बहार से बड़ी ही शांत प्रतीत हो रही थी। कभी तो वो आंखे बांध करती, कभी तो वो अस्त होता हुआ सूरत देखती,कभी वो क्रिकेट खेलते हुए बच्चे देखती तो कभी उड़ाते हुआ पंछीओ को देखती। वो सिर्फ देख ही नहीं रही थी पर उस हर एक चीज़ की अनुभूति भी कर रही  थी।  कभी बच्चो के साथ खेलती, कभी पंछी बन कर उड़ती।  कभी सूरज की किरणों की  गर्माहट का अनुभव होता तो कभी एक - दूसरे में उलझती हुई पर ठंडी हवा के साथ खेलते  हुए बालो का। आंखे बंध करे तो खुद में बहती हुई नदी का अनुभव होता, आंखे खोल कर ढलते हुए सूरज को देख कर खुद को ढला हुआ, बुजा हुआ महसूस करती। ऐसा लग रहा था जैसे हर एक पल पर कुछ अंदर मर रहा है और उसके उठ कर खड़े होने की सम्भावना नहीवट थी। हर एक क्षण उसके अंदर एक नयी कहानी का जनम होता था।  माँ जैसे अपने बच्चो  को प्यार करती है वैसे ही वो कहानियो से प्यार करती थी। उसमे जीना, उनके साथ खेलना, हसना, रोना, घूमना और उसके ही साथ वो मर जाना चाहती थी, पर कुछ तो था जो उसे उस कहानियो का गर्भाधान करने से रोक रहा था।  वो एक क्षण अपनी कहानी को महसूस करती और दूसरे क्षण वो कहानी उसकी ना रहती।  न पूरा सोच पाती थी ना ही पूरा लिख पाती  थी।


खुद का अस्तित्व क्या है वो खोजतेखोजते जीना भी भूल गयी। उसका जनम लेने का मकसद समाज नहीं आ रहा था। उसने कही पढ़ा था की आपका जनम कोई न कोई कार्य सिद्ध करने के लिए हुआ होता है पर अभी तक उसको ''वो '' कार्य मिला नहीं था। सभी परस्थितिओ को अनुकूल होते होते वो खुद को जैसे भूल ही गयी थी।


इतना सब कुछ करते हुआ भी कुछ न कुछ तो छूट ही जाता था।  इस स्वार्थी दुनिया में कोई अपना सा
नहीं लगता था; बस ये सूरज, चाँद, सितारे और इन पंछीओ का कलरव ही अपना सा लगता था। ना ही घर जाना था , ना ही दोस्तों के साथ जाना था, ना ही किसी को कहना था, ना ही किसी को कुछ सुनाना था।  खुद का दायरा कुछ पुस्तक, मैगजीन्स, बुक्स और कागज़ - कलम तक सिमित कर दिया था। छोटा सा गोल दायरा अब तो बस एक बिंदु बन कर रह गया था।  खुद का अस्तित्व खोजते खोजते दुनिया से तो दूर हो गयी पर  कागज़ और कलम के रूप में खुद को पा  लिया था। 


1 comment:

Unknown said...

Life is like flow and the same way you have described your life in these blog.The composition of words are good and you can enhance some points by putting deep-rooted words. 👌👌👌

what does depression feels like in professional life?

Hello! I am doing my master's and working as a freelancer part-time. I often feel depressed. one day one of my friends asked what does i...